भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबोल न जानने वाले की जो विद्या है, कंजूस का जो धन है और डरपोक का जो भुजबल है,—ये तीनों संसार में व्यर्थ हैं। देव, मत्पिता वृद्धः काशीं प्रति गच्छन्मया शिक्षां पृष्टः—'तात, मया किं कर्त्तव्यम्' इति। पित्रा चेत्थमभ्यधायि— 'यदि तव हृदयं विद्वन्सुन्नयं स्वप्नेऽपि मा स्म सेविष्ठाः। सचिवजितं षण्ढजितं युवतिजितं चैव राजानम् ॥ ४६ ॥ पातकानां समस्तानां द्वे परे तात पातके। एक दुःसचिवो राजा द्वितीयं च तदाश्रयः ॥ ५० ॥ अ (१) विवेकमतिर्नृपतिर्मन्त्री गुणवत्सु वक्रितग्रीवः। यत्र खलाश्च प्रबलास्तत्र कथं सज्जनाकसरः ॥ ५१ ॥ राजा सम्पत्तिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणाश्रयः। भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ५२ ॥ महाराज, अपने काशी जाते बूढ़े पिता से मैंने सीख माँगी कि—'तात, मुझे क्या करना उचित है?' पिता ने इस प्रकार कहा:—'विद्वान् बेटे, यदि तेरे हृदय में सुनीति है तो स्वप्न में भी मंत्री के, नपुंसक के और तरुणी के वशीभूत राजा की सेवा न करना। हे तात, सब पापों में दो पाप सबसे बड़े हैं—एक बुरे मंत्रीवाला राजा और दूसरा उसका आश्रय। जहाँ विवेक बुद्धि शून्य राजा हो, जहाँ गुणियों पर टेढ़ी गरदन रखने- वाला (पराङ्मुख) मंत्री हो और खल दुष्ट प्रबल पड़ते हों, सज्जन को वहाँ अवसर कहाँ? संपत्तिहीन होने पर भी सेवनीय गुणों से मंडित राजा की सेवा करनी उचित है। कालांतर में उससे जीवन पर्यत फल मिलता है। अदातुर्दाक्षिण्यं नहि भवति। देव, पुरा कर्ण-दधिचि-शिवि- विक्रम-प्रमुखाः क्षितिप्तयो यथा परलोकमलङ्कुर्वाणा निजदानसमु- द्भूतदिव्यनवगुणैर्निवसन्ति महीमण्डले, तथा किमपरे राजानः। दान न करने वाले में उदारता नहीं होती। देव, प्राचीन काल में कर्ण, (१) अविवेका विवेकरहिता मतिः बुद्धिर्यस्य सः।