भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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२८ भोजप्रबन्धः शत्रु का शस्त्र, कवि को कष्ट और मृगनयनाओं का नीवीबंध। (एक पाठ 'नीवीवन्धो मृगीदृशां' के स्थान पर 'गर्विताञ्च गौरवम्' है, अर्थ-- 'अभिमानियों का मान' ।) राजा ने एक लाख मुद्रा दिया। ततस्तस्मिन्मृगयारसिके राजनि कश्चन पुलिन्दपुत्रो गायति। तद्गीतमाधुर्य्येण तुष्टो राजा तस्मै पुलिन्दपुत्राय पञ्चलक्षं ददौ। तदा कविस्तद्दानमत्युन्नतं किरातपोतं च दृष्ट्वा नरेन्द्रपाणिकमलस्थपङ्कज- मिषेण राजानं वदति— एते हि गुणाः पङ्कज सन्तोऽपि न ते प्रकाशमायान्ति । यल्लक्ष्मीवसतेस्तव मधुपैरुपभुज्यते कोशः ॥ ६७ ॥ भोजस्तमभिप्रायं ज्ञात्वा पुनर्लक्षमेकं ददौ । तदनंतर राजा के मृगया में अनुरक्त रहने पर किसी भील के बेटे ने गाया। उस गीत माधुरी से संतुष्ट हो राजा ने भील के पुत्र को पाँच लाख दिये। तब कवि ने उस किरात पुत्र के अनुपात में दान को कहीं अधिक देखकर राजा के करकमल में स्थित कमल के व्याज से राजा से कहा- हे कमल, रहने पर भी तेरे वे गुण प्रकट नहीं हो पाते क्योंकि लक्ष्मी के निवास स्थल तेरे कोश का उपभोग भ्रमर कर लेते है। भोज ने उसका अभिप्राय समझ कर फिर एक लाख दिया। ततो राजा ब्राह्मणमाह— 'प्रभुभिः पूज्यते विप्र कलैव न कुलीनता । कलावान्मान्यते मूर्ध्नि सत्सु देवेषु शम्भुना' ॥ ६८ ॥ एवं वदति भोजे कुतोऽपि (१) पञ्चषाः कवयः समागताः । तान्दृष्ट्वा राजा विलक्षण इवासीत्—'अद्यैव मयैतावद्वित्तं दत्तम्' इति । ततः कविस्तमभिप्रायं ज्ञात्वा नृपं पद्ममिषेण पुनः प्राह.... 'किं कुप्यसि कस्मैचन सौरभसाराय कृप्य निजमधुने ! यस्य कृते शतपत्र प्रतिपत्रं तेऽद्य मृग्यते भ्रमरैः' ॥ ६६ ॥ तब राजा ने ब्राह्मण से कहा- (१) पंच वा षड् वा पञ्चषाः “संख्ययाव्ययासन्ना०” इत्यनेन बहुव्रीहिः।