भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ भोजप्रबन्धः कविः- 'पठ्यते' । एतासामरविन्दसुन्दरदृशां द्राक्चामरान्दोलना- दुल्ललद्गुजवल्लिकङ्कणझणत्कारः क्षणं वार्यताम् ॥ ७५ ॥ यथा यथा भोजयशो विवर्धते सितां त्रिलोकीमिव कर्तुमुद्यतम् । तथा तथा मे हृदयं विदूयते प्रियालकालीधवलत्वशङ्कया' ॥ ७६ ॥ ततो राजा शंकरकवये द्वादशलक्षं ददौ। सर्वे विद्वांसश्च विच्छाय- वदना बभूवुः। परं कोऽपि राजभयान्नावदत्। राजा च कार्यवशाद्- गृहं गतः । राजा द्वारा उसे प्रविष्ट कराने का आदेश होने पर दाहिना हाथ ऊपर उठाये वह ब्राह्मण बोला- राजन्, उन्नति हो। राजा ने पूछा- हे शंकर कवि, पत्रिका में क्या है ? कवि- पद्य । राजा- किसके निमित्त ? कवि- हे भोजराज, आपके ही निमित्त । राजा- तो पढ़िए । कवि- पढ़ता हूँ- परंतु क्षण भरको इन कमल के समान सुंदर नयनों वाली रमणियों के जल्दी-जल्दी चँवर डुलाने के कारण हिलती भुजलताओं में पड़े कंकणों के झणत्कार का निवारण तो कीजिए । हे भोज, तीनों लोकों को सफेद करने को उद्यत आपका यश जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे-वैसे अपनी प्रिया की अलकावली के श्वेत हो जाने की आशंका से मेरा हृदय व्यथित होता है । तब राजा ने शंकर कवि को बारह लाख दिये । और सब विद्वानों के मुख उतर गये, परंतु राजा के डर से सब चुप रहे । राजा कार्यवश बाहर चला गया । ततो विभूपालां सभां दृष्ट्वा विबुधगणस्तं निनिन्द- 'अहो नृपतेरज्ञता । किमस्य सेवया । वेदशास्त्रविचक्षणेभ्यः स्वाश्रयकविभ्यो लक्षमदात् । किमनेन वितुष्टेनापि । असौ च केवलं ग्राम्यः कविः शंकरः । किमस्य प्रागल्भ्यम् ।' इत्येवं कोलाहलरवे जाते कश्चिदभ्यगात्