भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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भोजप्रबन्धः ४३ काव्यं करोमि नहि चारुतरं करोमि यत्नात्करोमि यदि चारुतरं करोमि । भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ हे साहसाङ्क कवयामि वयामि यामि ॥ ६४ ॥ तब बुनकर राज भवन में पहुँच कर राजा को प्रणाम करके बोला— 'महाराज, आपका मंत्री मुझे मूर्ख समझ कर घर से निकाल रहा है, तो तू देख कि मैं मूर्ख हूँ या पंडित— काव्य रचता हूँ, पर सुंदर नहीं रचता और यदि प्रयत्नपूर्वक रचता हूँ तो सुंदर भी रच लेता हूँ। राजाओं की मुकुट मणियों से सुशोभित चरण पीठ वाले हे महावीर, मैं कविता करता हूँ और बुनाई करता हूँ; और (अब) जाता हूँ।' ततो राजा त्वङ्कारवादेन वदन्तं कुविन्दं प्राह—'ललिता ते पद- पङ्क्तिः, कवितामाधुर्यं च शोभनम्, परन्तु कवित्वं विचार्य वक्तव्यम्' इति। ततः कुपितः कुविन्दः प्राह—'देव अत्रोत्तरं भाति किन्तु न वदामि। राजधर्मः पृथग्विद्वद्धर्मात्' इति। राजा प्राह—'अस्ति चेदुत्तरं ब्रूहि' इति। तब राजा ने 'तू' शब्द से संबोधित करने वाले बुनकर से कहा—'तेरे पद की पंक्ति ललित है, कवितामाधुरी भी सुंदर है, परंतु काव्य विचार करके सुनाना चाहिए।' तब कुपित हो बुनकर बोला—'महाराज, मुझे इसका उत्तर आता है, परंतु कह नहीं रहा हूँ। राजा का धर्म विद्वान् के धर्म से भिन्न है।' राजा ने कहा—'यदि है तो उत्तर दे।' कुविन्दः प्राह--'देव, कालिदासाहतेऽन्यं कविं न मन्ये । कोऽस्ति ते सभायां कालिदासाहते कवितातत्त्वविद्विद्वान् । यत्सारस्वतवैभवं गुरुकृपापीयूषपाकोद्भवं तल्लभ्यं कविनेव नैव हठतः पाठप्रतिष्ठाजुषाम् । कासारे दिवसं वसन्नपि पयःपूरं परं पङ्किलं कुर्वाणः कमलाकरस्य लभते किं सौरभ (१) सौरिभः ॥ ६५ ॥ (१) “लुलायो महिषो वाहद्विपत्कासरसैरभाः” इत्यमरात् महि इत्यर्थः ।