भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ४५ तब बुनकर ने कहा— 'हे स्वामी, आपको ऐसा मोह कैसे उत्पन्न हुआ ? स्मरण कीजिए— बाल्यावस्था में पुत्रों की, सुरतकाल में स्त्रियों की, स्तुति करते समय कवियों की और युद्ध में योद्धाओं की एकवचन युक्त 'तू'--वाली बोली ही प्रशंसनीय होती है।' तब राजा ने सुंदर; हे कुविंद, सुंदर'--ऐसा कह कर उसे प्रत्यक्षर एक लाख दिया और फिर उस बुनकर से कहा—'जा, निर्भय रह ।' ---: ० :--- ७—रात्रौ राज्ञो नगर-भ्रमणम् एवक्रमेणातिक्रान्ते कियत्यपि काले बाणः पण्डितवरः परं राज्ञा मान्यमानोऽपि प्राक्तनकर्मतो दारिद्र्यमनुभवति । एवं स्थिते नृपतिः कदाचिद्रात्रावेकाकी प्रच्छन्नवेषः स्वपुरे चरन्बाणगृहमेत्यातिष्ठत् । तदा (१) निशीथे बाणो दारिद्र्याद्व्याकुलतया कान्तां वक्ति-'देवि, राजा कियद्वारं मम मनोरथमपूरयत् । अद्यापि पुनः प्रार्थितो दास्येव । परन्तु निरन्तरप्रार्थनारसे मूर्खस्यापि जिह्वा जडीभवति।' इत्युक्त्वा मुहूर्तार्धं मौनेन स्थितः । इसी प्रकार धीरे-धीरे कुछ समय व्यतीत होने पर राजा के द्वारा परम संमानित होने पर भी पंडितवर बाण पूर्व जन्म के कर्म के कारण दरिद्रता भोग रहे थे। ऐसी ही दशा में कभी रात में अकेले वेष बदल कर अपनी नगरी में घूमते-फिरते राजा बाण के घर पहुँच रुक गये। तभी रात में दरि- द्रता के कारण व्याकुल बाण ने पत्नी से कहा—'राजा ने कितनी बार मेरा मनोरथ पूर्ण किया। आज भी फिर प्रार्थना करने पर देता ही है। किंतु निरन्तर प्रार्थना में लगे रहते मूर्ख की जीभ जड़ हो जाती है। ऐसा कह कर आधे मुहूर्त तक चुप बैठा रहा। पुनः पठति— हर हर पुरहर परुषं क हलाहलफल्गु याचनावचसोः । एकैव तव रसज्ञा तदुभयरसतारतम्यज्ञा ॥ ६६ ॥ देवि, (१) अर्द्धरात्रे ।