भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

भोजप्रबन्धः ५१ ततो राजा प्रत्यक्षरमुक्ताफललक्षं ददौ। फिर घर पहुँच कर कुछ समय पश्चात् सभा में बैठा राजा कालिदास से बोला—‘मित्र, ‘कवियों के मानसरूपी मन को नमस्कार, जिसके प्रतिभा-जल में तिरते हैं। तब कवि ने कहा (पूर्ति कर दी)— ‘चौदहों भुवन हंस के बच्चों जैसे!’ तब राजा ने प्रत्यक्षर लाख-लाख मोती दिये। ततः प्रविशति द्वारपालः-- 'देव, कोऽपिकौपीनावशेषो विद्वान्द्वारि तिष्ठति' इति। राजा—'प्रवेशय।' ततः प्रवेशितः कविरागत्य 'स्व- स्ति' इत्युक्त्वाऽनुक्त एवोपविष्टः प्राह-- इह निवसति मेरुः शेखरो भूधराणा- मिह हि निहितभाराः सागराः सप्त चैव। इदमसुलमनन्तं भूतलं भूरिभूतो- द्भवधरणसमर्थं स्थानमस्मद्विधानाम् ॥ ११३ ॥ तदनन्तर द्वारपाल ने प्रवेश किया (और कहा)—'देव, कौपीन मात्र धारण किये एक विद्वान् द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है।' राजा ने कहा— 'भीतर ले आओ।' तब प्रवेशित कवि ने आकर कहा—'स्वस्ति' और बिना किसी के कहे ही बैठ गया और बोला— 'इस ओर पर्वतों में श्रेष्ठ सुमेरु स्थित है और इधर ही पूर्ण भार युक्त सातों समुद्र हैं, यह अतुलनीय, अन्त हीन, प्रभूत प्राणियों की उत्पत्ति और उनका पालन-पोषण करने में समर्थ भूतल हम जैसे व्यक्तियों का स्थान है।' राजा--'महाकवे, किं ते नाम ? अभिधत्स्व। राजा—'महाकवे, तुम्हारा नाम क्या है ? बताओ।' कविः—'नामग्रहणं नोचितं पण्डितानाम्। तथापि वदामो यदि जानासि। नहि स्तनन्धयी बुद्धिर्गम्भीरं गाहते वचः। तलं तोयनिधेर्द्रष्टुं यष्टिरस्ति न वैष्णवी ॥ ११४ ॥