भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ भोजप्रबन्धः और फिर उन्होंने उसे उपाय बताया—'हे सुभगे, यह कालिदास हमारे यश को गला रहा है। हममें कोई कला के क्षेत्र में इसके समान नहीं है। सो बच्ची, तुम ऐसा करो कि राजा इसे इस देश से दूसरे देश को निकाल दे।' दासी बोली—'आप लोगों से हार पाकर मेरे द्वारा आपका काम हो सकता है। सो पहिले मुझे हार दीजिए।' तदनन्तर उनके द्वारा दिया हार पाकर वह पानवाली दासी विचार करने लगी कि—'विद्वानों द्वारा असाध्य क्या है?' (विद्वान् क्या नहीं कर सकते ? ) ततः सन्नतिक्रामत्सु कतिपयवासरेषु दैवादेकाकिनि प्रसुप्ते राजनि चरणसंवाहनादिसेवामस्य विधाय तत्रैव कपटेन नेत्रे निमील्य सुप्ता। ततश्चरणचलनेन राजानमीषज्जागरूकं सम्यग्ज्ञात्वा प्राह—'सखि मदन- मालिनि, सादुरात्मा कालिदासो दासीवेषेणान्तः पुरं प्राप्य लीलादेव्या सह रमते। तदनन्तर कुछ दिन बीतने पर भाग्य वश जब राजा अकेला सो गया तो राजा के पैर दबाने आदि सेवा करके तांबूल वाहिका दासी वहीं कपट पूर्वक नेत्र बन्द करके (नींद का बहाना करती) लेट गयी। तत्पश्चात् पैरों के इधर उधर डुलाने से राजा को थोड़ा जागा हुआ भली भाँति समझ कर (सोते-सोते जैसे) कहने लगी—'सखी मदनमालिनी, वह दुष्टात्मा कालिदास दासी के वेष में रनिवास में प्रविष्ट होकर लीला देवी के साथ रमण करता है।' राजा तच्छ्रुत्वोत्थाय प्राह—'तरङ्गवति, किं जागर्षि' इति। सा च निद्राव्याकुलेव न शृणोति। राजा च तस्या अपध्वनिं श्रुत्वा व्यचिन्त- यन्—'इयं तरङ्गवती निद्रायां स्वप्नवशंगता वासनावशाद्देव्याः दुश्चरितं प्राह। स च स्त्रीवेषेणान्तःपुरमागच्छतीत्येतदपि सम्भाव्यते। को नाम स्त्रीचरितं वेद' इति। राजा यह सुन उठ कर बोला—'तरङ्गवती, क्या जाग रही है?' उसने- जैसे कि वह नींद में बेसुध हो, ऐसी स्थिति प्रकट करते हुए—सुना ही नहीं। राजा ने उसकी बर्राहट सुनकर सोचा—'नींद में सपना देखते हुए अवचेतना के वश इस तरंगवती ने रानी के दुश्चरित्र को कह दिया है। वह (कालिदास)