भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( ७ ) 'फल' के प्रति हास्यास्पद 'वामन की उद्बाहुता' है और उसका दुष्फल भोगने को उसे तैयार रहना है, फिर भी—मगर फिर भी । भोगने दो 'मन्द' को 'कवि यशः प्रार्थी' बनने के लोभ का कुपरिणाम ! 'भोज-प्रबंध' के अनेक हिन्दी-रूप हैं; ऐसी स्थिति में 'विद्योत्तिनी' का उद्योगी इस उद्यम को अपना देवमंदिर की देहली पर एक वराटी चढ़ाने का अधिकार मानता है । और यह अधिकार उसे मिलना ही चाहिए। कविवर मैथिलीशरण के शब्दों में— 'जय देवमंदिर देहली, समभाव से जिस पर चढ़ी नृप हेम मुद्रा और रंकवराटिका। २६-ग, हीरापुरी, गोरखपुर, विश्वविद्यालय परिसरः —देवर्षि सनाढ्य वि० सं० २०३५