भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंगच्छन्ति ब्राह्मणा इव।' ततः सा समेत्य सर्वानपश्यत् । उपेत्य च कालिदासं प्राह-- एकेन राजहंसेन या शोभा सरसोऽभवत् । न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥ १५२ ॥ सर्वे च बाणमयूरप्रमुखाःपलायन्ते, नात्र संशयः' इति । कालिदासः- 'प्रिये, वेगेन वासांसि भवनादानय, यथा पलायमानान्विप्रान्रक्षामि । किं पौरुषं रक्षति यो न (१) वार्तान किं वा धनं नार्थिजनाय यत्स्यात् । सा किं क्रिया या न (२) हितानुबद्धा किं जीवितं साधुविरोधि यद्वै ॥१५३॥ तब कालिदास रात में वहीं विलासवती की गृहवाटिका में रह रहा था, उसने रास्ते में जाते उन सब कवियों की बातचीत सुनकर वेश्या की दासी को भेजा--'प्रिये, ये कौन ब्राह्मण जैसे जा रहे हैं?' तब उसने जाकर सबको देखा और कालिदास के पास पहुँचकर कहा-- एक राजहंस से सरोवर की जैसी शोभा होती है वैसी चारों ओर तीर पर एकत्र सहस्रों बगुलों से नहीं । सब बाण, मयूर आदि कवि भागे जा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं । कालिदास ने कहा--'प्रिये, शीघ्रतया घर से वस्त्र लेकर आओ कि इन भागे जाते विप्रों की रक्षा कर सकूँ । जो दुःखियों की रक्षा न करे, वह पौरुष कैसा और जो याचकों के काम न आ सके, वह धन कैसा ? वह कर्म भी क्या, जिससे हित न हो सके और उस जीवन से क्या लाभ, जिससे सज्जन-विरोध हो ?' ततः स कालिदासश्चारणवेषं विधाय खड्गमुद्वहन्क्रोशाधमुत्तरं गत्वा तेषामभिमुखमागत्य सर्वान्निरूप्य 'जय' इत्याशीर्वचनमुदीर्य पप्रच्छ चार- णभाषया - 'अहो विद्यावारिधयः, भोजसभायां सम्प्राप्तमहत्त्वातिशयाः, बृहस्पतय इव सम्भूय कुत्र जिगमिषवो भवन्तः । कच्चित्कुशलं वः । राजा च कुशली। अस्माभिः काशोदेशादागम्यते भोजदर्शनाय वित्तस्पृहया च । तब कालिदास ने चारण का वेष बना, खड्ग-धारण कर आधे कोस उत्तर जा, उनके संमुख पहुँच कर सबको देखा और 'जय' यह आशीर्वचन ( १ ) वा आर्तान् इति च्छेदः । ( २ ) या हितं नानुवध्नाति ।