भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ७३ ततः सर्वे विचारयन्ति स्म-अहो, इयं साक्षात्सरस्वती पुंरूपेण सर्वेषामस्माकं परित्राणायागता । नायं भवितुमर्हतिमर्त्यः । अद्यापि किमपि केनापि न ज्ञायते। ततः शीघ्रमेव गृहमासाद्य शकटेभ्यो भारमुत्तार्य प्रातः सर्वैरपि राजभवनमागन्तव्यम् । न चेच्चारण एव निवेदयिष्यति । ततो झदिति गच्छाम।' इति योजयित्वा तथा चक्रुः । तब वे सब विचारने लगे--'अहो, यह साक्षात् सरस्वती ही पुरुष रूप में हमारी रक्षा के लिए आयी थी । यह मनुष्य नहीं हो सकता । अभी तक किसी को कुछ भी नहीं मालूम हुआ है । सो शीघ्र ही घर पहुँच और गाड़ियों से समान उतार कर प्रभात में सबको राज भवन में पहुँचना ठीक होगा, अन्यथा चारण ही निवेदन कर देगा । सो झट चल देते हैं।' ऐसी योजना बनाकर उन्होंने उसी के अनुसार किया । ततो राजसभां गत्वा राजानमालोक्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा विविशुः । ततो बाणः प्राह--'देव, सर्वज्ञेन यत्त्वया पठ्यते तदीश्वर एव वेद । केऽमी वराका उदरम्भरयो द्विजाः । तथाप्युच्यते- तुलणं (१) अणु अणुसरइ ग्लोसो मुहचन्दस्स खु एदाए । अणु इंदि वण्णयदि कहं अणुकितिं तस्सप्पडिवदि चन्दस्स ॥१५४॥ तदनन्तर वे राजा सभा में जाकर राजा को देख 'स्वस्ति' ऐसा कह कर बैठ गये । तब बाण बोला--'महाराज, सर्वज्ञ आपके द्वारा जो पढ़ा गया, उसे तो ईश्वर ही जानता है, हम बेचारे पेट भरू ब्राह्मणों की तो गणना ही क्या ? तथापि निवेदन है-- 'कभी न हो सकता है चंदा इस मुखेंदु के तुल्य । प्रतिपद को प्रतिक्षीण चंद्रमा--नहीं सुमुखि, मुख तुल्य ।' राजा यथाव्यवसितस्याभिप्रायं विदित्वा 'सर्वथा कालिदासो दिवसप्रा- प्यस्थाने निवसति । उपायैश्च सर्वं साध्यम्' इत्याह । ततो बाणाय रु- क्माणां पञ्चदशलक्षाणि प्रादात् । सन्तोषमिषेणैव विद्वद्वृन्दं स्वं स्वं सदनं प्रेषितम् । (१) तुलनामन्वनुसरति ग्लोसो मुखचन्द्रस्य खल्वेतस्याः । अन्विति वर्ण्यते कथमनुकृतिस्तस्य प्रतिपदि चन्द्रस्य ॥ इति च्छाया।