भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ७५ 'घोड़े दौड़ाओ।' तत्पश्चात् क्रीड़ा-उद्यान जाने के समय से संबद्ध नगाड़े का घोष हुआ- 'इस समय राजा देव-पूजा में व्यग्र हैं, ऐसा सुनते हैं कि पुनः अभी क्रीडा-उद्यान में जायेंगे, सो एकत्र हो सभी भट अनुगमनार्थ प्रस्तुत हो गये। तब राजा विद्वानों के साथ घोड़े पर चढ़ कर उस प्रदेश में पहुँचा, जहाँ रात्रि को चारण की घटना हुई थी। ततो राजा चरतां चौराणां पदज्ञाननिपुणानाहूय प्राह- 'अनेन वर्त्मना यः कोऽपि रात्रौ निर्गतस्तस्य पदान्यद्यापि दृश्यन्ते, तानि पश्यन्तु' इति। ततो राजा प्रतिपण्डितं लक्षं दत्त्वा तान्प्रेषयित्वा च स्वभवनमगात्। ते च पदज्ञा राजाज्ञया सर्वतश्चरन्तोऽपि तमन्वेक्ष- माणा विमूढा इवासन्। तब राजा ने चोरों के आने-जाने से बने पैरों के चिह्नों की पहिचान करने में निपुण व्यक्तियों को बुलाकर कहा- 'इस मार्ग से कोई रात में गया है, उसके पैरों के चिह्न आज भी दीख रहे हैं, उन्हें खोजो।' राजा ने प्रत्येक पंडित को लाख-लाख दिया उन्हें भेज कर अपने महल को लौट गया। वे पद- चिह्न-ज्ञानी व्यक्ति राजा की आज्ञा से सब ओर घूमघाम कर भी पद-चिह्न वाले व्यक्ति को न ढूँढ पाये और मूर्ख बन बैठे। ततश्च लम्बमाने सवितरि कामपि दासीमेकं पदत्राणं त्रुटितमादाय चर्मकारवेश्म गच्छन्तीं दृष्ट्वा तुष्टा इवासन्। ततस्तत्पदत्राणं तया चर्मकारकरे न्यस्तं वीक्ष्य तैश्च तस्याः करान्मिषेणादाय रेणुपूर्णे पथि मुक्त्वा तदेव पदं तस्येति ज्ञात्वा तां च दासीं क्रमेण, वेश्याभवनं विश- न्तीं वीक्ष्य तस्या मन्दिरं परितो वेष्टयामासुः। ततश्च तैः क्षणेन (१) भोजश्रवणपथविषयमभिज्ञानवार्ता प्रापिता। ततो राजा सपरैः सामात्यः पद्भ्यामेव विलासवतीभवनमगात्। फिर वे सूरज-ढले एक दासी को एक फटा जूता लेकर चमार के घर जाती हुई देखकर कुछ प्रसन्न हुए। उस जूते को उसके द्वारा चमार के हाथ में रखा देख उन्होंने बहाने से उसके हाथ से उसे लिया और धूल भरे रास्ते में छोड़ कर और (इस प्रकार उसकी छाप से) समझ लिया कि वह पद चिह्न (१) भोजप्रतीत्यर्थः ।