भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ८१ः 'देव (१) त्वद्दानपाथोधौ दारिद्र्यस्य निमज्जतः । न कोऽपि हि करालम्बं दत्ते मत्तेभदायक ॥ १६६ ॥ ततस्तुष्टो राजा तस्मै त्रिंशद्गजेन्द्रान्प्रादात् । तत्पश्चात् एक ब्राह्मण का बेटा फुक्का-फाड़ रोता आया । सभी लोग आश्चर्य में पड़ गये कि यह क्यों फुक्का-फाड़ रो रहा है ? राजा ने अपने संमुख बुलाया और पूछा । वह बोला— 'हे मतवाले हाथियों के दाता महाराज, आपके दान रूपी जलनिधि में डूबते हुए दारिद्र्य को कोई हाथ का सहारा भी नहीं दे रहा है ।' तो प्रसन्न हुए राजा ने उसे तीस गजराज दे डाले । ततः प्रविशति पत्नीसहितः कोऽपि विलोचना विद्वान् 'स्वस्ति' इत्यु- क्त्वा प्राह— 'निजानपि गजान्भोजं ददानं प्रेक्ष्य पार्वती । गजेन्द्रवदनं(२)पुत्रं रक्षत्यद्य पुनः पुनः' ॥ १६७ ॥ ततो राजा सप्त गजांस्तस्मै ददौ । तदनंतर कोई नेत्र हीन पंडित पत्नी सहित आया और 'स्वस्ति' कहकर बोला— 'अपने हाथियों को भी दे डालने के इच्छुक भोज को देखकर पार्वती आज अपने गजराज के मुखवाले पुत्र की रक्षा बार-बार कर रही है ।' तो राजा ने सात हाथी उसे दे दिये । ततो राजा विद्वत्कुटुम्बं तदैव पुरतः स्थितं वीक्ष्य ब्राह्मणं प्राह— 'क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ।' तब राजा ने विद्वान् के कुटुम्ब को पूर्वोक्त रूप में ही सम्मुख खड़ा देख कहा—'बड़े जनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधन से ।' वृद्धद्विजः प्राह— 'घटो जन्मस्थानं मृगपरिजनों भूर्जवसनो वने वासः कन्दान्दिकमशनमेवंविधगुणाः । अगस्त्यः पाथोधिं यदकृत कराम्भोजकुहरे क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे' ॥ (१) त्वद्दानसमुद्रे । (२) गजाननमिति यावत् । ६ भोज०