भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥ भोजप्रबन्धः 'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्योपेतः ( १ ) भोजराजस्य राज्यप्राप्तिः स्वस्ति श्रीममहाराजाधिराजस्य भोजराजस्य प्रबन्धः कथ्यते— आदौ धाराराज्ये सिन्धुलसंज्ञो राजा चिरं प्रजाः पर्यपालयत् । तस्य वृद्धत्वे भोज इति पुत्रः समजनि। स यदा पञ्चवार्षिकस्तदा पिता ह्यात्मनो जरां ज्ञात्वा मुख्यामात्यानाहूयानुजं मुञ्जं महाबलमालोक्य पुत्रं च बालं वीक्ष्य विचारयामास— मंगल हो। श्री महाराजाधिराज भोजराज की कथा कही जाती है— प्राचीन काल में सिंधुल नामक राजा बहुत समय तक प्रजा का परिपालन करता रहा। उसके बुढ़ापे में भोज नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। वह जब पाँच वर्ष का था तब पिता ( राजा ) ने अपना बुढ़ापा समझ मुख्य मंत्रियों को बुलाया और अपने छोटे भाई मुंज को महाबली और पुत्र (भोज) को बालक देख कर विचार करने लगा। 'यद्यहं राज्यलक्ष्मीभारधारणसमर्थं सोदरमपहाय राज्यं पुत्राय प्रयच्छामि, तदा लोकापवादः । अथवा बालं मे पुत्रं मुञ्जो राज्य- लोभाद्विषादिना मारयिष्यति, तदा दत्तमपि राज्यं वृथा। पुत्रहानि र्वंशोच्छेदश्च । यदि मैं राज्यलक्ष्मी का भार उठाने में समर्थ सगे भाई को छोड़कर (५ वर्ष के) पुत्र को राज्य दूँ तो लोकनिंदा होगी। अथवा मेरे अबोध बालक पुत्र को राज्य लोभ से मुंज विष आदि द्वारा यदि मरवा देगा तो दिया हुआ राज्य भी व्यर्थ हो जायेगा। पुत्र की हानि होगी और वंश का विनाश भी हो जायगा।