भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 190 में से

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भोजप्रबन्धः ८५ भोजः-तर्हि किमपि पठ । द्विजः--भोजं विना मत्पदसरणिं न कोऽपि जानाति । भोजः--ममाप्यमरवाणीपरिज्ञानमस्ति । राजा च मयि स्निह्यति । त्वद्- गुणं च श्रावयिष्यामि । किमपि कलाकौशलं दर्शय । विप्रः-किं वर्णयामि । राजा--कलमानेतान्वर्णय । विप्रः-'कलमाः पाकविनम्रा मूलतलाघ्रातसुरभिकह्लाराः । पवनाकम्पितशिरसः प्रायः कुर्वन्ति परिमलश्लाघाम्' ॥ १७४ ॥ राजा तस्मै सर्वाभरणान्युत्तार्य ददौ । एक बार आखेट-रस में मग्न राजा भागते सूअर को देख कर स्वयम् अकेला ( उसका पीछा करता ) दूर वन में जा पहुँचा । वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को देख कर बोला-- द्विज, कहाँ जा रहे हो ? द्विज--धारानगर । राजा-किसलिए ? द्विज-धन पाने की इच्छा से भोज के दर्शनार्थ । वह पंडित को देता है और मैं भी मूर्ख से याचना नहीं करता । भोज-ब्राह्मण, तो तुम विद्वान् हो अथवा कवि हो । द्विज-हे महाभाग, मैं कवि हूँ । भोज-तो कुछ पढ़ो । द्विज-भोज के अतिरिक्त मेरी कविता का अर्थ कोई नहीं समझ सकता । राजा-मुझे भी देववाणी का ज्ञान है और मुझसे राजा स्नेह करता है । मैं तुम्हारे गुण उसे सुनाऊँगा । कुछ अपनी कला का कौशल दिखाओ । द्विज--क्या वर्णन करूँ । राजा-इन धानों का वर्णन करो । द्विज--पकजाने से झुके हुए धानों की जड़ में शुष्क कमल दल की सुगंध है । करते हैं श्लाघा परिमल की मंद पवन में झूम-झूम कर । राजा ने उसे सब आभूषण उतार कर दे दिये ।

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