भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ : भोजप्रबन्धः विक्रमार्क त्वया दत्तं श्रीमन्ग्रामशताष्टकम् । अर्थिने द्विजपुत्राय भोजे त्वन्महिमा कुतः ॥ १७९ ॥ प्राप्नोति कुम्भकारो महिमानं प्रजापतेः । यदि भोजोऽप्यवाप्नोऽति प्रतिष्ठां तव विक्रम' ॥ १८० ॥ 'हे विक्रमादित्य, तुम्हारे त्याग का वर्णन कैसे हो ?' तुम इसे उचित नहीं समझते थे कि कोई अभागा 'बरतन दो'-- ऐसा आकर भी बोले, इतना पर्याप्त देना उचित समझते थे कि मँगता भविष्य में मँगता रह ही न जाय। 'श्रीमन् विक्रमादित्य, तुमने याचक ब्राह्मण पुत्र को एक सौ आठ गाँव दे दिये थे, भोज को आप जैसी महिमा कहाँ से प्राप्त हो ? हे विक्रमादित्य, यदि कुम्हार भी प्रजापति ब्रह्मा की महिमा प्राप्त कर सकता है, तो भोज भी आपके समान प्रतिष्ठा पा सकता है।' राजा--'लोके सर्वोऽपि जनः स्वगृहे निःशङ्कं सत्यं वदति । मयि वान्येन वा सर्वथा विक्रमार्कप्रतिष्ठा न शक्या प्राप्तुम्' । राजा ने सोचा-संसार में सभी लोग अपने घर में निःशंक हो सत्य कहते हैं। मैं अथवा अन्य कोई विक्रमादित्य की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकता। ततः कदाचित्कश्चित्कवी राजद्वारं समागत्याह-'राजा द्रष्टव्यः इति । ततः प्रवेशितो राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः पठति- 'कविषु वादिषु भोगिषु देहिषु द्रविणवत्सु सतामुपकारिषु । धनिषु धन्विषु धर्मधनेष्वपि क्षितितले नहि भोजसमो नृपः ॥१८१॥ राजा तस्मै लक्षं प्रादात् । सर्वाभरणान्युत्तार्य तं च तुरगं ददौ । फिर कभी एक कवि राजद्वार में आकर बोला-'राजा का दर्शन चाहता हूँ ।' तदनन्तर प्रविष्ट किये जाने पर राजा को 'स्वस्ति' यह कह कर उसकी आज्ञा से बैठकर उसने पढ़ा-- भूतल पर कवियों, वक्ताओं, भोगियों, शरीरधारियों, पैसे वालों, सज्जनों के उपकारियों, धनियों, धनुर्धारियों और धार्मिकों में भोज के समान नरपाल नहीं है । राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दी और उतार कर समस्त आभूषण और घोड़ा दिया ।