भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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२० शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से जो पन्द्रह दिन की पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, उन्हें क्रमशः (१) प्रतिपदा, (२) द्वितीया, (३) तृतीया, (४) चतुर्थी, (५) पंचमी, (६) षष्ठी, (७) सप्तमी, (८) अष्टमी, (६) नवमी, (१०) दशमी, (११) एकादशी, (१२) द्वादशी, (१३) त्रयोदशी, (१४) चतुर्दशी, तथा (१५) पूर्णिमा के नाम से अभिहित किया जाता है। इसके बाद कृष्णपक्ष की तिथियों को भी प्रतिपदा से चतुर्दशी तक इन्हीं नामों से पुकारा जाता है परन्तु कृष्णपक्ष की अन्तिम अर्थात् पन्द्रहवीं तिथि को 'अमावस्या' कहा जाता है। दोनों पक्षों की प्रतिपदा से चतुर्दशी तक की तिथियों को क्रमशः १, २, ३, ४ आदि अंकों में लिखा जाता है, परन्तु पूर्णिमा को १५ तथा अमावस्या तिथि को ३०, अंक के रूप में लिखा जाता है।

तिथियों के स्वामी

विभिन्न देवताओं को विभिन्न तिथियों का स्वामी माना गया है। किस तिथि का स्वामी कौन-सा देवता होता है, इसे नीचे बताया गया है। जिस तिथि के स्वामी का जैसा स्वभाव है, वही स्वभाव उस तिथि का तथा उस तिथि में जन्म लेने वाले व्यक्ति का भी समझना चाहिए—

तिथिस्वामीतिथिस्वामी
प्रतिपदाअग्निनवमीदुर्गा
द्वितीयाब्रह्मादशमीकाल
तृतीयागौरीएकादशीविश्वेदेवा
चतुर्थीगणेशद्वादशीविष्णु
पंचमीशेषनागत्रयोदशीकामदेव
षष्ठीकार्तिकेयचतुर्दशीशिव
सप्तमीसूर्यपूर्णिमाचन्द्रमा
अष्टमीशिवअमावस्यापितर

नक्षत्र

ज्योतिषियों ने सम्पूर्ण आकाश-मण्डल को २७ भागों में विभक्त कर, प्रत्येक भाग को एक-एक 'नक्षत्र' की संज्ञा दी है। अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वी पर स्थान की दूरी को किलोमीटर आदि में नापा जाता है, उसी प्रकार आकाश में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी को नक्षत्रों के माध्यम से नापा जाता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर नापने की दूरी में किलोमीटर के अन्तर्गत मीटर, सेण्टीमीटर आदि होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक नक्षत्र को भी ४ चरण तथा ६० अंशों में विभाजित किया गया है। नक्षत्रों के 'अंश' को 'घटी' नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।