भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७५ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को पुरातत्त्व एवं आयु के क्षेत्र में कमी आती है तथा भाई-बहिन का सुख एवं पराक्रम भी न्यून रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण आर्थिक क्षेत्र में परिश्रम से लाभ होता है तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। ३४१ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा भाग्य की उन्नति करता है तथा धर्म-पालन में उदासीन- सा रहता है। भाई-बहिनों से सम्बन्ध भी सन्तोष- जनक नहीं रहता। सातवीं मित्रदृष्टि से स्वराशि वाले तृतीय भाव को देखने के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई के द्वारा थोड़ा सहयोग भी प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी, उद्योगी तथा तेजस्वी होता है। ३४२ 'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मिथुन लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को पिता की अच्छी शक्ति मिलती है तथा राज्य एवं व्यवसाय से भी लाभ तथा सम्मान प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने के कारण पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भूमि, भवन, सुख एवं मातृ-पक्ष में सफलता मिलती है। ऐसा जातक सुखी एवं सन्तुष्ट रहता है। ३४३