भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 215, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें२२३ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव के जातक की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों एवं सौन्दर्य में वृद्धि होती है तथा आमदनी अच्छी रहती है। सातवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति अपने लाभ के लिए कटु शब्दों का प्रयोग करता पाया जाता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्पर्क से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में अपने शान्त स्वभाव के द्वारा प्रभाव-स्थापित करता है, परन्तु मन में कुछ अशान्ति भी बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति का शरीर दुबला-पतला होता है। 'कर्क' लग्न में मंगल 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी रहती है तथा पिता, राज्य, सन्तान एवं विद्या का पक्ष भी दुर्बल रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन का सुख मिलता है। सातवीं उच्च दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष में असन्तोष- पूर्ण वृद्धि होती है तथा व्यवसाय में कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि के अष्टम भाव को देखने से पुरातत्त्व तथा दैनिक जीवन में कमी रहती है।