भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि के षष्ठभाव को देखने से धन की शक्ति द्वारा शत्रु पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में यश, धन, सहयोग तथा सफलता का लाभ होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का सुख मिलता है। पाँचवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि तथा क्लेश का शिकार बनना पड़ता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता रहता है। ऐसा व्यक्ति धर्मात्मा, धनी, हिम्मती तथा शत्रुजयी होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण लाभ होता है। शत्रु पक्ष में शान्ति से सफलता मिलती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता है। सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। नवीं मित्र दृष्टि से द्वादश भाव को देखने के कारण बाहरी संबंधों से लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक रहता है।