भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का त्रुटिपूर्ण लाभ होता है, परन्तु शत्रु पक्ष से अशान्ति मिलती है तथा भाग्य पक्ष दुर्बल रहता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। पाँचवीं उच्च दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या- बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में भी विशेष सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कर्क लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलता, सुख तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से कुछ असन्तोष के साथ माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रम तथा झगड़ों के द्वारा उन्नति करता है।