भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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पृष्ठ 229, कुल 638 में से

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२३७ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादशभाव को देखने से आमदनी भी अच्छी रहती है तथा धन का लाभ खूब होता है। ऐसे व्यक्ति को माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विजय मिलती है, परन्तु माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी तथा अशान्ति भी रहती है। लाभ के मार्ग में भी परतन्त्रता का योग बनता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी सम्बन्धों से सुख तथा लाभ मिलता है तथा खर्च अधिक रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्कलग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित सुख के प्रभाव से जातक को स्त्री, व्यवसाय तथा दैनिक आय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से जातक को शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, चातुर्य एवं सुख की प्राप्ति भी होती है।

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