भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२३६ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश 'कर्क' लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में स्वक्षेत्री शुक्र के प्रभाव से जातक को आमदनी अच्छी रहती है तथा माता, भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पूर्ण सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति योग्य, चतुर, धनी, सुखी तथा श्रेष्ठवाणी बोलनेवाला होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कर्क लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से सुख एवं लाभ उठाता है तथा उसका खर्च अधिक रहता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है तथा मातृभूमि से अलग भी रहना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु पक्ष में चातुर्य एवं खर्च से काम निकालने में सफलता मिलती है। 'कर्क' लग्न में 'शनि' 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कर्क लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है तथा शरीर में रोग भी रहता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई- बहिन का त्रुटिपूर्ण सुख मिलता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वक्षेत्र में सप्तमभाव को देखने से व्यावसायिक क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा स्त्री का सुख होने पर भी उससे कुछ परेशानी रहती है। दसवीं नीच-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता तथा राज्य के क्षेत्र में सफलता एवं सम्मान का सामान्य लाभ होता है।