भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४१ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कर्क लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में शत्रु मंगल की राशि में स्थित शनि के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या एवं बुद्धि के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से बुद्धिमती स्त्री मिलती है, परन्तु उसके कारण कुछ कष्ट भी होता है। व्यवसाय में भी बुद्धि-योग से सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय में कमी रहती है तथा कुटुम्ब द्वारा भी परेशानियां उठानी पड़ती हैं। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कर्क लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में प्रभाव बनाये रखता है परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिलती है। तीसरी दृष्टि में स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति बढ़ती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन से वैमनस्य रहता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कर्क लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा भोगादि के सुख भी खूब मिलते हैं। तीसरी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। दसवीं उच्च-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है।