भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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२४४ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब के सुख की हानि होती है। वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बल पर धन की वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है और कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी प्राप्त करता है। उसे अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सदैव चिंतित बने रहना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी तथा हिम्मती होता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है तथा कुछ कठिनाइयों के साथ भाई- बहिन का सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कठिन परिश्रम, गुप्त युक्तियों तथा पुरुषार्थ का सहारा लेता है। भीतरी रूप से कमजोर होने पर भी ऊपर से बड़ा हिम्मती दिखाई देता है। 'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कुछ कमी प्राप्त होती है तथा भूमि और भवन का सुख भी अल्प मात्रा में प्राप्त होता है। उसे देश छोड़ कर परदेश में भी रहना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति कभी-कभी असफलताओं का भी विशेष शिकार बनता है।