भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 638 में से

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२४८ 'कर्क' लग्न की कुण्डली के द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कर्क लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के धन की अत्यधिक हानि होती है तथा उसी के कारण बड़े संकटों का सामना भी करना पड़ता है। कुटुम्ब से क्लेश मिलता है। ऐसा व्यक्ति ऋण लेकर अपना काम चलाता है तथा परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों द्वारा अपने प्रभाव की रक्षा करता है।

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कर्क लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है। वह गुप्त युक्तियों, विवेक तथा कठिन परिश्रम द्वारा सफलता प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति उद्दण्ड स्वभाव तथा उग्र प्रकृति का होता है। भाई-बहिनों के सुख में भी कमी रहती है।

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कर्क लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी रहती है तथा परदेश में जाकर रहना पड़ता है। बार-बार स्थान का परिवर्तन भी करना पड़ता है। कभी-कभी घोर संकट भी आ जाते हैं। अन्त में उसे सामान्य सुख का लाभ भी होता है।

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