भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७७ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व में वृद्धि होती है, परन्तु सन्तान के पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या, बुद्धि में भी कुछ कमी रहती है । पाँचवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है। सातवीं मित्र दृष्टि द्वितीयभाव को देखने से जातक धन-वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। नवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमियों के साथ सफलता मिलती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है। पुरातत्त्व के क्षेत्र में सफलता मिलती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण शारीरिक प्रभाव, सुख एवं मनोबल की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से असन्तोष रहता है, परन्तु पराक्रम बढ़ता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि का यथेष्ट लाभ होता है, परन्तु गुरु के अष्टमेश होने के कारण हर क्षेत्र में कुछ कमी का अनुभव भी अवश्य होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पिता-पक्ष में हानि तथा राज्य के पक्ष में सम्मान मिलता है। विद्या, बुद्धि, सन्तान तथा पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। सातवीं मित्र- दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख मिलता है। नवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष से परेशानी होती है तथा झगड़े-झंझटों के कारण चिंताएं घेरे रहती हैं।