भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३३ जन्म-कुण्डली के द्वादशभाव [कुण्डली चक्र: प्रथम (तनु), द्वितीय (धन), तृतीय (सहज), चतुर्थ (सुहृद्), पंचम (पुत्र), षष्ठ (रिपु), सप्तम (जाया), अष्टम (आयु), नवम (धर्म), दशम (राज्य), एकादश (लाभ), द्वादश (व्यय)] ३ उक्त नामों को अन्य नामों के भी पुकारा जाता है। द्वादश भावों के विभिन्न नाम तथा किस भाव द्वारा किन-किन विषयों का विचार किया जाता है, इसे निम्नानुसार समझना चाहिए— (१) पहला भाव—इसे प्रथम, तनु, लग्न, केतु आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के स्वरूप, आकृति, आयु, चिह्न, जाति, मस्तिष्क, विवेक, शील, सुख-दुःख आदि के विषय में विचार किया जाता है। लग्नेश की स्थिति एवं बलाबल के आधार पर जातक को कार्यकुशलता एवं जातीय-उन्नति-अवनति का ज्ञान भी इसी भाव से प्राप्त होता है। इस भाव का कारक 'सूर्य' है। यदि इस भाव में मिथुन, कन्या, तुला अथवा कुम्भ—इनमें से कोई राशि हो तो उसे बलवान माना जाता है। (२) दूसरा भाव—इसे द्वितीय, धन, वित्त, पणफर आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के स्वर, सौन्दर्य, सत्यवादन, आंख, नाक, कान, कुल, कुटुम्ब, मित्र, सुखोपभोग, बन्धन, गायन, क्रय-विक्रय, रत्न, स्वर्ण-चाँदी, धन, संचित पूँजी आदि के विषय में विचार किया जाता है। (३) तीसरा भाव—इसे तृतीय, सहज, पराक्रम, भ्रातृ, आपोक्लिम आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के पराक्रम, शौर्य, धैर्य, साहस, कर्म, सहोदर, सेवक, आयुष्य, काम, योगाभ्यास तथा क्षय-श्वास, दमा आदि रोगों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। (४) चौथा भाव—इसे चतुर्थ, सुहृद्, सुख, केन्द्र आदि नामों से भी पुकारा

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