भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५३ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति खूब होती है तथा धर्म का पालन भी होता है। स्त्री भाग्यशालिनी मिलती है, फलतः विवाहोपरान्त विशेष लाभ होता है। चौथी मित्र-दृष्टि से द्वादशभावको देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में भी वृद्धि होती है। आठवीं उच्च-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं तथा स्त्री एवं कुटुम्ब के सुख में भी कमी रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर दुर्बल रहता है, परन्तु सम्मान की प्राप्ति होती है। सातवीं उच्च दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष से वैमनस्य रहता है तथा विद्या-बुद्धि में कुछ कमी बनी रहती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से धन का पर्याप्त लाभ होता है। स्त्री-पक्ष से भी सुख तथा लाभ की प्राप्ति होती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख भी पर्याप्त मिलता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान से असन्तोष तथा विद्या-बुद्धि में कमी रहती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष में भी कुछ कमी रहती है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से व्यवसाय में लाभ होता है।