भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३८७ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व में वृद्धि होती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता, यश एवं लाभ की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से परिश्रम द्वारा धन की पर्याप्त वृद्धि होती है तथा कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त होता है। बाहरी स्थानों से भी सम्बन्ध जुड़ता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृश्चिकलग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है एवं पिता, राज्य और व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएं मिलती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों मतभेद रहता है तथा पराक्रम में सामान्य वृद्धि होती है। संक्षेप में, ऐसा व्यक्ति सुखी जीवन बिताता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश वृश्चिकलग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता, सहयोग, लाभ एवं सम्मान की प्राप्ति होती है। यह अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए उग्र कर्म भी करता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से जातक का अपनी माता के साथ वैमनस्य रहता है तथा भूमि एवं भवन के सुख में कमी रहती है।