भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन-संचय में सफलता मिलती है तथा कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त होता है। परन्तु वह धर्म का यथाविधि पालन नहीं करता। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा आयु की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा भाग्यशाली होता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : चंद्र तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी आती है। मानसिक शक्ति बहुत प्रबल होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा यशस्वी एवं भाग्यशाली बनता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्र' का फलादेश वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : चंद्र चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को कुछ असन्तोष के साथ माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है। यह धर्म का पालन करता है तथा मनोयोग के द्वारा भाग्य की उन्नति करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में सुख, सम्मान, लाभ एवं सफलता की प्राप्ति होती है।