भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित उच्च के 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती है। आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति कुछ रूखे स्वभाव का भी होता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से लाभ भी होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी बढ़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में विवेक-बुद्धि एवं विनम्रता से काम निकालता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन भ्रमणशील होता है तथा चित्त में कुछ अशान्ति भी बनी रहती है। 'वृश्चिक' लग्न में 'गुरु' 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में श्रेष्ठ सफलता मिलती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में पहले सामान्य कठिनाइयां आती हैं, किन्तु बाद में लाभ भी होता है। स्त्री से भी सुख मिलता है। नवीं उच्चदृष्टि से नवम भाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की विशेष उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी तथा भाग्यशाली होता है।