भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४३१ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की आमदनी में कुछ कठिनाइयों के साथ अच्छी वृद्धि होती है। सातवीं मित्र तथा उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पर्याप्त सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति गुणी, विद्वान्, सज्जन, मधुरभाषी तथा सुखी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश धनु लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ विलम्ब के साथ सफ- लता मिलती है और लाभ होता है। धर्म-पालन में रुचि अधिक नहीं होती, परन्तु धर्म तथा परोपकार में ही अधिक खर्च होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं पर प्रभाव बना रहता है तथा शत्रु-पक्ष, झगड़े, मुकदमे आदि से लाभ एवं विजय की प्राप्ति भी होती है। 'धनु' लग्न में 'चन्द्रमा' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश धनु लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। शरीर सुन्दर तथा स्वस्थ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक आमदनी में भी जातक को कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं।