भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३३ ‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘पंचमभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश धनु लग्न : पंचमभाव : चंद्र पाँचवें भाव में ‘मंगल’ की राशि पर स्थित अष्ट- मेश ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमियों का सामना करना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है, किन्तु मस्तिष्क में चिन्ताएं भी रहती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयों के बाद सामान्य सफलता मिलती है। ‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘षष्ठभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश धनु लग्न : षष्ठभाव : चंद्र छठे भाव में शत्रु ‘शुक्र’ की राशि पर स्थित उच्च के ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक का शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं नीच-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्चे की परेशानी रहती है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध भी अच्छे सिद्ध नहीं होते। ऐसे व्यक्ति को शत्रु-पक्ष के कारण कुछ मान- सिक परेशानियां भी रहती हैं। ‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘सप्तमभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश धनु लग्न : सप्तमभाव : चंद्र सातवें भाव में मित्र ‘बुध’ की राशि पर स्थित अष्टमेश ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कठिना- इयाँ आती हैं। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा दैनिक जीवन भी कुछ आनन्दमय बना रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है, परन्तु स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। थोड़े परिश्रम से ही थक जाया करता है।