भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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४४० 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का विशेष सुख मिलता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय से भी लाभ होता है परन्तु स्त्री-सुख में कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन उल्लासपूर्ण एवं शानदार बना रहता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'शनि की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का यथेष्ट सुख मिलता है। अपनी विवेक-बुद्धि से उसे प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती रहती है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनु लग्न: चतुर्थभावः बुध चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी प्राप्त होती है। स्त्री तथा गृहस्थी के सुख में भी कठिनाइयां आती हैं। सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में शक्ति एवं सफलता प्राप्त होती है।