भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४३ 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब होती है। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में भी पर्याप्त सुख, यश, धन, लाभ तथा सम्मान प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का सुख भी यथेष्ट मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, विद्वान् तथा यशस्वी होता है। 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश धनुलग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ प्राप्त होता है। पिता, राज्य तथा स्त्री के सुख की हानि होती है। जन्म-स्थान में रहकर व्यवसाय करने से घाटा होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष एवं झगड़े-मुकदमे के मामलों में सफलता होती है। 'धनु' लग्न में 'गुरु' 'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश धनुलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य एवं सुख की प्राप्ति होती है। भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय का सुख भी मिलता है। नवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति विद्वान्, गुणी, सुन्दर, धनी, धर्मात्मा, मधुरभाषी, सज्जन तथा आनन्दी होता है।