भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० 'राहु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [चक्र: राहु की दृष्टि — भाव १: राहु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'राहु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'केतु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [चक्र: केतु की दृष्टि — भाव १: केतु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'केतु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। विशेष टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार राहु तथा केतु की खण्ड दृष्टियाँ एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद होती ही नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ज्योतिष में राहु- केतु की न तो ग्रहों के अन्तर्गत गणना की गई है और न इनके दृष्टि-सम्बन्ध का ही