भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६६ 'मकर' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'मकर' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६३ से १२०४ के बीच देखना चाहिए। २—'मकर' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६३ (ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६४ (ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६५ (घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६६ (ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६७ (च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६८ (छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ११६६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०० (झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०१ (ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०३ (ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या १२०४ ● 'मकर' लग्न में 'सूर्य' 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मकर लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है तथा कभी-कभी विशेष शारीरिक कष्टों का सामना भी करना पड़ता है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के पक्ष में सामान्य कठिनाई रहती है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ परेशानियां आती रहती हैं।
कुण्डली विवरण (मकर लग्न, प्रथम भाव : सूर्य):
- भाव १ (लग्न): १० (मकर), सूर्य
- भाव २: ११ (कुम्भ)
- भाव ३: १२ (मीन)
- भाव ४: १ (मेष)
- भाव ५: २ (वृषभ)
- भाव ६: ३ (मिथुन)
- भाव ७: ४ (कर्क)
- भाव ८: ५ (सिंह)
- भाव ९: ६ (कन्या)
- भाव १०: ७ (तुला)
- भाव ११: ८ (वृश्चिक)
- भाव १२: ९ (धनु) (कुण्डली संख्या: १०६५)