भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५३२ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव शुक्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के शुक्र के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का विशेष सुख मिलता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख का भी अत्यधिक लाभ होता है। वह बड़ा धनी, यशस्वी तथा प्रतिष्ठित होता है। सातवीं मित्र तथा नीचदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व की शक्ति में कुछ कमी आती है तथा दैनिक जीवन में भी कुछ चिन्ताएं बनी रहती हैं। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई- बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने से भाग्य की अत्यधिक उन्नति होती है तथा धर्म का भी यथाविधि पालन होता है। ऐसा व्यक्ति पराक्रमी, धनी, सुखी तथा धर्मात्मा होता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में स्वराशि स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। भाग्य तथा धर्म की उन्नति भी होती रहती है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति सुखी तथा भाग्यवान् होता है।