भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५३७ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति चिन्ता- युक्त रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी उठाता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का अनुभव होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती हैं। दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्तित रहना पड़ता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा अपने प्रभाव की वृद्धि करता है तथा शत्रुओं पर विजय पाता है। शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है। तीसरी मित्र- दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व शक्ति की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। दसवीं नीचदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से परेशानी रहती है तथा व्यवसाय में कठिनाइयाँ आती हैं। खर्च अधिक रहता है। तीसरी उच्च तथा मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, यश, सम्मान तथा प्रभाव की वृद्धि होती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है।