भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३६ 'कुम्भ' लग्न की कुंडली में 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्नः एकादशभावः शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। खर्च खूब रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ भी मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव तथा यश की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि की पर्याप्त वृद्धि होती है तथा सन्तान-पक्ष का कुछ त्रुटिपूर्ण लाभ होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन से खर्च पूर्ण रहता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्नः द्वादशभावः शनि बारहवें भाव में स्वराशि स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से विशेष लाभ होता है। यात्राएं भी करनी पड़ती हैं। तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष से कुछ परेशानी रहती है, परन्तु बाद में उस पर प्रभाव स्थापित होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से धर्म का पालन होता है तथा भाग्य की वृद्धि होती रहती है। 'कुम्भ' लग्न में 'राहु' 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शरीर में कहीं चोट लगती है तथा स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कमी रहती है। वह गुप्त चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है, परन्तु मस्तिष्क की शक्ति से प्रभाव भी स्थापित करता है।