भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 638 में से

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५५८ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपनी आमदनी की खूब बढ़ाता है। शत्रु-पक्ष पर भी विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ विधा-बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। १३२५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी रहती है। शत्रु-पक्ष भी कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से खर्च के बल पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी तथा क्रोधी भी होता है। १३२६ 'मीन' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, सम्मान तथा यश की वृद्धि होती है। वह मधुरभाषी, सर्वप्रिय तथा प्रभावशाली होता है। उसे सन्तान तथा विद्या-बुद्धि का भी श्रेष्ठ लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बुद्धि- बल से अच्छा लाभ होता है। १३२७

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