भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 638 में से

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५६१ 'मीन' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। विद्या एवं सन्तान-पक्ष में कमी रहती है। धन तथा मस्तिष्क अशान्त रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव के देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सामान्य जीवन बिताता है। १३३४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति तथा धर्म पालन में रुकावटें आती हैं। सन्तान तथा विद्या का पक्ष भी कमजोर रहता है। मन-मस्तिष्क में परेशानियां रहती हैं। सातवीं उच्च-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में पर्याप्त वृद्धि होती है। १३३५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में वांछित सफलताएँ प्राप्त होती हैं। वह विद्वान्, नियमों का पालक, बुद्धिमान् तथा संतति- वान भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा भाग्यशाली होता है। १३३६

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