भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७८ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक कुछ कठिनाइयों के साथ अपनी आमदनी में अत्यधिक वृद्धि करता है। आयु, पुरातत्त्व शक्ति तथा पराक्रम की भी विशेष वृद्धि होती है। भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है। स्वार्थ-साधन में चतुर होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि का तो लाभ होता है, परन्तु सन्तान पक्ष में प्रयत्नों से ही सफलता मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से उसे लाभ होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की कुछ हानि होती है। भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी कमी आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से चतुराई के बल पर शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति झगड़ों से बचे रहने का प्रयत्न करता है। 'मीन' लग्न में 'शनि' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित व्ययेश शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में न्यूनाधिकता बनी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख-दुःख तथा व्यवसाय में हानि-लाभ की प्राप्ति होती रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने के कारण पिता से वैमनस्य रहता है, राज्य से परेशानी होती है तथा व्यवसाय में संघर्षों का सामना करना पड़ता है।