भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१६ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभावः चन्द्र ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपने मनोबल के प्रभाव से अपनी आय के साधनो को बढ़ाता तथा सुखी जीवन बिताता है। सामान्यतः उसे आय के साधनो में कुछ कठिनाइयां आती रहती है। सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र की राशि वाले पंचम भाव को देखता है, अतः जातक विद्वान् बुद्धिमान् तथा सन्ततिवान् होता है। कुल मिलाकर ऐसी ग्रह स्थिति वाला व्यक्ति विद्या बुद्धि के द्वारा अपनी उन्नति करता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेषलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि में स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शुभ कार्यों तथा शान-शौकत मे खर्च करने वाला तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध रखने वाला होता है। सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र बुध की राशि वाले षष्ठभाव को देखता है, अतः जातक शत्रु पक्ष पर शान्ति से विजय पायेगा तथा अपनी बुद्धिमत्ता से हर प्रकार के झगड़ों को निपटाने में सफल हुआ करेगा। कुल मिला कर ऐसी ग्रहस्थिति का व्यक्ति सुखी तथा सन्तुष्ट जीवन बिताने वाला एवं शत्रुपक्ष पर अपनी शालीनता से विजय पाने वाला होता है। 'मेष' लग्न में 'मंगल' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मेष लग्नः प्रथमभावः मंगल पहलेभाव में स्वराशि स्थित मंगल के प्रभाव से जातक पुष्ट शरीर वाला आत्म-बली तथा साहसी होता है। आठवें भाव का स्वामी होने तथा उसे पूर्ण दृष्टि के कारण मंगल जातक को कभी-कभी रोगों का शिकार भी बना देता है परन्तु आयु लम्बी देता है। सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भवन को भी देखता है। अतः जातक को अपनी पत्नी तथा व्यवसाय के मामले में कुछ हानि भी उठानी पड़ती है।