भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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६८ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश पांचवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर 'मेष लग्न : पंचमभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं। चौथी दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु तथा पुरातत्व का साथ देता है। सातवीं दृष्टि से सम-शनि की राशि के ग्यारहवें भाव को देखने से कुछ कठिनाइयो के साथ लाभ के योग उपस्थित करता है तथा आठवीं दृष्टि से मित्र गुरु के बारहवें भाव को देखने के कारण खर्च अधिक कराता है तथा बाहरी स्थानों से आजीविका के सम्बन्ध बनाता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश छठे भाव में मित्र बुध की राशि में मेष लग्न : षष्ठभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक शत्रुजयी, साहसी तथा निर्भय होता है। चौथी दृष्टि से शनि की राशि के दसवें भाव को देखने के कारण भाग्यो- न्नति में कठिनाइयाँ देता है। सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की राशि के बारहवें भाव को देखने के कारण खर्च अधिक तथा बाहरी स्थानों से लाभ कराता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने के कारण जातक को शरीर से स्वस्थ, स्वाभिमानी तथा प्रवल प्रभाव वाला बनाये रखता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सातवें भाव में शुक्र की राशि में स्थित मेष लग्न : सप्तमभाव : मंगल मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं। चौथी उच्च दृष्टि से शनि की राशि के दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य द्वारा उन्नति के साधन तथा यश देता है। सातवी दृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने से जातक के शरीर को स्वस्थ तथा प्रभावशाली बनाता है। आठवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक को धन तथा कुटुम्ब वृद्धि के लिए अधिक परिश्रम करने पर भी न्यून सफलता देता है।