बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)
Bijaganitam of Bhaskaracharya II with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्गप्रकृतिः। ३३ अथ संश्लिष्टकुट्टके करणसूत्रं वृत्तम्। *एको हरश्चेद्गुणकौ विभिन्नौ तदा गुणैक्यं परिकल्प्य भाज्यम्। अग्रैक्यमग्रं कृत उक्तवद्यः संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकोऽसौ ॥ १३॥ उदाहरणम्। कः पञ्चनिघ्नो विहृतस्त्रिषष्ट्या सप्तावशेषोऽथ स एव राशिः। दशाहतः स्याद्विहृतस्त्रिषष्ट्या चतुर्दशाग्रो वद राशिमेनम् ॥ १ ॥ अत्र गुणैक्यं भाज्योऽयमेव राशिः। अग्रैक्यं शुद्धिरिति। न्यासः-भा १५। हा ६३। क्षेपः २१। पूर्ववज्जातो गुणः १४। लब्धिः ३। इति श्रीभास्कराचार्यविरचिते बीजगणिते कुट्टकाध्यायः। अथ वर्गप्रकृतिः। तत्र रूपक्षेपपदार्थे तावत् करणसूत्राणि सार्धपञ्चवृत्तानि। इष्टं ह्रस्वं तस्य वर्गः प्रकृत्या क्षुण्णो युक्तो वर्जितो वा स येन। मूलं दद्यात् क्षेपकं तं धनर्णं मूलं तच्च ज्येष्ठमूलं वदन्ति ॥ १ ॥
- वि०--अत्र प्रश्नानुसारेणाधोलिखितं समीकरणद्वयमुत्पद्यते(१) प्रगु. या - प्रशे प्रल= ────────── हा द्विगु. या - द्विशे द्विल= ────────── हा अतः प्रल. हा = प्रगु या - प्रशे द्विल. हा = द्विगु. या -- द्विशे प्रथमं द्वितीयगुणेन द्वितीयं प्रथमगुणेन निहत्य जातं समीकरणद्वयम्। . द्विगु. प्रल. हा. = द्विगु. प्रगु. या - द्विगु. प्रशे प्रगु. द्विल. हा = द्विगु. प्रगु. या - प्रगु. द्विशे अनयोरन्तरे कृते हा (द्विगु. प्रल - प्रगु. द्विल) = प्रगु. द्विशे - द्विगु. प्रशे, अतो मिथो गुणगुणितछेद- (१) वि० श०--प्रल + द्विल = प्रगु. या - प्रशे + द्विगु. या - द्विशे ──────────────────── हा या (प्रगु + द्विगु) - (प्रशे + द्विशे) = ──────────────────── हा ततः सामान्यकुट्टकरीत्या'या' इत्यव्यक्तराशेर्मानं व्यक्तमिति मूलसूत्रमुपपद्यते । .