बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १६ - सामहेलउ हुवड¹ राइ परिवार² ॥ मोट दो छगी मालयह । तडह तुरीय संपिगा घनर तुलाह ॥ उलीभ चंडीवडवूह³ राइ न बारह यार⁴ । स्वामी खोड सामुही याई घर पार⁵ ॥ कुलीय छत्री सदृगल छह⁶ । सरव सुहागण सुन्दर नारि ॥ ल्हा उतारइ अपउरा । राजा हो क्षात्रीय⁷ माह⁸ दुवारि ॥२३॥ तोरण आनीयउ बीसलराउ । थवहर सूहय कउतिग जाइ ॥ मोत्यां का घाया पड़ई⁹ । चोबा¹⁰ चन्दन तिलक¹¹ सिंदुरि ॥ ─────────────────────────── १. आ० ६ सामुदउ हुई, आ० १२ सामइलउ । २ आ० राजा परवार । ३. आ० १२ चडीपोहै । ४ आ० १२ राय न लाईयवार । ५. आ० १२ स्वामी मुसामई आई छै बार । ६. आ० १२ कुलीय छुतीचे सगलैछै । यह छन्द आ० ६ में २५, आ० १२ में ७४ और २५ है किन्तु आ० ६ और आ० १२ में पंक्ति ९-१० नहीं हैं । ७ आ० १२ घ्याईयो । ८. आ० १२ बीद । ९. आ० २ किया, आ० ६ हूया, आ० १२ पड़े । १०. आ० ६ करू । ११. आ० १२ तेल ।