भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 130
  • २४ - दीन्हा तातीय तुरीय गुमाइ ॥ दीन्हो१ राज देव मणोवरठ । माग समुंद२ सोरठ गुजरात३ ॥२९॥ कंथि४ जनोइव५ पहिरह६ चीर । हाथि७ तम्बारह८ धंजल९ नीर ॥ राजा पहदल१० साइतड११ । सीसन पालथी साभट्ट सउडि१२ ॥ पुछीय क्षत्री ने पावती । पाय पपलितह पुनियड मडइ ॥ १. आ० ६ दीधो, आ १२ दीनउ । २. अ० २ समद । ३. आ० १२ गुजरात । यह छंद आ० ६ में ३२ आ० ६ में ५७, अ० २ में ६१, आ० १२ में ३१ है । इस छंद की ४थी पंक्ति अ० २ में है :—"दीवा साचन खरथ भंटार ।" तथा आ० ६ में है :—"दीना सामइणी नवसर हार ।" आ० १२ में दूसरी पंक्ति है :—सगलो अतेवर बेटो छे आद । चौथी पंक्ति है :—दीना तेनीय तुरी घउपाइ ॥ ४. आ० ६ गलइ, आ० १२ पहिंथि । ५. आ० ६ जनोई राश, आ० १२ जनेऊ । ६. आ० १२ रहपहिरणी । ७. आ० ६ हाये । ८. आ० ६ तम्ब्राले राजा, आ० १२ प्रथालू । ९. आ० ६ अचले, आ० १२ अजलि । १०. आ० ६ पिद्दलइ, आ० १२ दियो छे । ११. आ० १२ दायजी । १२. आ० १२ सौडि ।
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य) · पृष्ठ 130, कुल 315 में से · BharatKosha