बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- २७ - ब्याह करावण देइछइ¹ दान । अरथ भंडार नहूँ² क्षति घणउ³ मान ॥ दोन्हा छहूँ⁴ तेजो हासला । तुम्ह हासीय सरिसउ⁵ कोट इसार ॥३३॥ जूरा रमण बइसारहूँ⁶ छहूँ⁷ राय । सात सोपारी फूलिकियउ⁸ पसाउ ॥ सवालाप कड मुरडउ⁹ । राजागी जोतउ छहूँ¹⁰ सातेदाइ¹¹ ॥ राजमती बिलपी हुई । दसइ मुलकई चौसठ राहू ॥३४॥ १ आ० १२ दीवैछै । २. आ० १२ नै । ३. आ० १२ घण । ४ आ० १२ दीनछै । ५. आ० १२ सरिस । यह छंद आ० ६ में २६ तथा आ० १२ में ३५ है । आ० ६ में २री ओर तीसरी पंक्ति के अनन्तर एक पंक्ति और इस प्रकार है— “आवो पुरोहित रात्र का !” ६ आ० १२ बैसारयो । ७ आ १२ छै । ८. आ १२ पलकियो । ९ आ० ६ मुदहउ । १०. आ० १२ जोता छै । ११. आ० १२ सातेइदाउ । यह छंद आ० ६ में ३७, आ० १२ में ३६ है । आ० १२ में तीसरी पंक्ति नहीं है । अंतिम पंक्ति है— “इसे मुलकै तब बीसलराउ ।”