भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • २६ - परणि धरण धरि चालीय चाय¹ । बाजा² वाजीया नीसागरे घाट्ट ॥ दोयइ मानइ³ दुदयडी । बाजइ⁴ धरू थरूवलीभेरि⁵ ॥ धारिकि ऊमी धाइइ । धारकउ दीप⁶ चालउ⁷ अजमेर ॥३७॥ ✗ परिअउरण⁸ धरि⁹ आयउ¹⁰ राय¹¹ । सगली हे जाणमांहि हुउ उछाह ॥ १. आ० १२ चालीयौ गउ । २ आ० ६ वाजा हो । ३. आ० १२ वाजाइछै । ४. आ० १२ बाजै छै । ५. आ० १२ भलीभेरि । ६ आ० ६ द्विज, आ० ६ दीरक । ७. आ० ६ (में यह शब्द बाद मे बढाया गया है) आ० ६ गढ अजमेर, आ० १२ चल्यौ । यह छन्द आ० ६ में ४०, आ० ६ में ६६, अ० २ में ६६, आ० १२ में ३६ है । लेकिन अ० १ मे इस छन्द का पाठ है— हुई पहिरावणी हणीयउ राई । अनल षधी राजकुमार ॥ चीरी चढीयो भोजकी । वाजइ धरगू भूगलभेर ॥ हुवउ पधारउ रावलइ । धार कठ द्विज चाल्यो अजमेर ॥ आ० १२ में ५वीं पंक्ति है :-वारि कि ऊमी धीइदइ ! ८ आ० ६ परणि अरण्डि, अ० २ परणी, आ० ६ परणी नै, आ० १२ परणि अरण्डि । ६. अ० २, आ० ६ (मे नही है) । १०. अ०, आयउ, आ० १२ चालीयौ । ११. अ० २, आ० ६, वीसलराय, राउ ।